अपना भारत देश आध्यात्मिक दृष्टि से संसार में अग्रगण्य है। प्रवचन आदि धार्मिक कार्य यहाँ चलते ही रहते हैं, भगवान् और सन्तों ने अवतार लेने के लिये इसी भूमि को स्वीकार किया है। जैसे उत्तराखण्ड देवभूमि है, उसी प्रकार महाराष्ट्र प्रदेश सन्तों की कर्मभूमि है। इस कर्मभूमि में सन्त श्रीज्ञानेश्वर, सन्त श्रीतुकाराम, सन्त श्रीगजानन महाराज, सन्त श्रीसखाराम आदि अनेक सन्त अवतरित हुए हैं। उन सन्त महात्माओं में देउलगाँव के सन्त श्री नारायण पुरी जी महाराज का भी नाम आता है।
‘बुडता हे जन देखवे डोवा म्हणूनी कश्रवका येत्त असे‘
अर्थात्
अज्ञानी जन अन्धकार में डूब रहे हैं, यह आँखों से देखा नहीं जाता, इसीलिये सन्त अवतार लेते हैं एवं उन्हें सन्मार्ग बताते हैं। ऐसा सन्त श्रीतुकाराम महाराज ने अपने अभंग में कहा है।
Shri Narayan Puri Ji Maharaj का जन्म कहाँ पे हुआ था ?
सन्त श्री नारायण पुरी जी महाराज मराठवाड़ा के छोटे से ढाकली (त० आंबद) गाँव में बालरूप में प्रकट हुए थे
- वे कहाँ से आये
- उनके माँ-बाप कौन हैं?
इसका पता लगाने के लिये गाँववालों ने कोशिश की, परंतु कोई भी बात का पता नहीं चला। वे बचपन से ही श्रीरामभक्त थे। वे सदैव रामायण सद्ग्रन्थका पाठ किया करते, पढ़ने के लिये उन्हें किसी स्कूल में जाने की जरूरत नहीं पड़ी।
महाराज की रामभक्ति
इतनी छोटी उम्र में उनकी रामभक्ति देखकर गाँववाले उनपर बेहद खुश थे। गाँव छोटा था, किंतु गाँव में आस्तिक लोगों का परिमाण शत-प्रतिशत था। महाराज ने गाँववालों की सहायता से सुन्दर श्री राममन्दिर का निर्माण किया था। आगे चलकर उन्होंने वारि के श्रीहनुमान्जी का कठोर तप किया।
महाराज जी की देवी उपासना
तदनन्तर अपने काले रंग के घोड़े पर सवार होकर अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए, वे यहाँ देउलगाँव साकरशा गाँव को आये। यह स्थान महाराष्ट्र प्रान्त के बुलडाणा जिले में स्थित है। यहाँ श्री दुर्गा माता का जागरूक देवस्थान है।
मन्दिर के आगे से जानेवाली उत्तरवाहिनी उत्ताबत्ती नामक नदी है। आस-पास के हरे-भरे खेत, कई पुराने पेड़, हरी-भरी झाड़ी इस प्रकार निसर्गरम्य स्थान देखकर महाराज ने यहाँ रहना स्वीकार किया।
माँ दुर्गा की उन्होंने तन, मनसे पूजा-अर्चना की, इसीलिये माँ दुर्गा उनपर प्रसन्न तो थी हीं, उन्हें कई बार दर्शन भी देती थीं।
कहते हैं कि हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति श्रीशिवाजी महाराज अपने भाई शम्भाजी राजे के साथ घोड़ेपर सवार होकर यहाँ माता के दर्शन को आये थे। माँ तुलजा भवानी ने उनको तलवार दी थी, जो उन्हें सदैव यश दिलाया करती थी।
गाँव में रहकर महाराज ने अनेक नास्तिक लोगों को ईश्वरभक्ति का मार्ग दिखाया। कई लोगों को व्यसनमुक्त कर उन्हें सन्मार्ग दिखाया। तृष्णा निवारने के लिये गाँव के लोगों की सहायता से बहुत बड़ा कुआँ खुदवाया। लोगों को उनके कई चमत्कार दिखायी दिये, इसीलिये गाँव के आस-पास के कई लोग उनके भक्त बन गये थे।
एक बार गाँव में प्लेग की बीमारी आने से गाँव के लोग घर छोड़कर जंगल में रहने को चले गये थे। बार-बार रोग आने से गाँववाले लोग हैरान हो गये थे। ‘महाराज! हमारे लिये कुछ भी करो और इस महामारी से हमें बचाओ।’ ऐसी गाँववालों ने महाराज से प्रार्थना की, तब महाराज ने माँ भगवती का शतचण्डी यज्ञ करने की सोची। यज्ञ की तैयारी हुई। दूर-दूरसे विद्वान् ब्राह्मणों को बुलाया गया था, धूमधाम से यज्ञ की तैयारी हुई और यज्ञ शुरू हो गया था।
किंतु यज्ञ में घी की कमी होने की सम्भावना आने लगी, इसीलिये भक्त चिन्तित हो गये थे। उस वक्त आज जैसी गाँव में वाहन की व्यवस्था नहीं थी, गाँव का सब घी भक्त पहले ही एकत्रित कर चुके थे। इस घटना से नास्तिक लोगों ने सन्त-निन्दा करना शुरू किया। भावुक भक्त अप्रसन्न हो गये थे।
यह बात जब महाराज को ज्ञात हुई, तब महाराज ने माँ के मन्दिर में जाकर प्रार्थना की, ‘माँ दुर्गा! अब तू ही मेरी इज्जत रख, यज्ञ निर्विघ्न पूरा करना अब तेरे ही हाथ में है, यज्ञ में घी की कमी आ रही है, निन्दक मेरी निन्दा कर रहे हैं।’ तब माता ने गुप्तरूप से महाराज को कहा कि-मेरे पीछे नदी में से चार गागर पानी भरकर भक्तों के हाथ से रख दो। महाराज के कहने पर भक्तों ने वैसा ही किया और हरिनाम-संकीर्तन शुरू हो गया।
थोड़ी देर से जाकर देखा तो इस पानी का घी में रूपान्तर हो गया, यह चमत्कार देखकर भावुक भक्त नतमस्तक हो गये तो निन्दकों ने भी अपनी गर्दन नीचे झुकायी।
महाराज का घोड़ा भी ईश्वरभक्त ही था, वह एकादशी व्रत तो करता ही था तथा प्रतिदिन हरिभजन (भगवान्के अभंग) गाकर महिलाओं के द्वारा पीसे हुए धान, चने की दाल आदि ही खाता था। महाराज ने समाज को सही दिशा दिखायी तथा भक्तों को मोक्ष का मार्ग दिखाया।
एक दिन शरद्पूर्णिमा की चाँदनी रात में महाराज भक्तों के साथ माता के मन्दिर के आगे बैठे थे। भक्त दूध की खीर (रबड़ी) बना रहे थे। आध्यात्मिक स्वरूप की बातें चल रही थी।
बातों-बातों में महाराज ने भक्तों को माघ महा पंचमी के दिन समाधि लेने की इच्छा बतायी तो सभी भक्त उदास और चुप हो गये।
इसपर महाराज ने कहा-‘अरे! ऐसे व्यर्थ दुखी मत होइये, जन्म लेनेवाले की मृत्यु अवश्य होती है। कुरुक्षेत्र में भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को कहा है –
‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।’
अर्थात् आत्मा अमर है, आत्मा को कोई भी शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती। जैसे हम पुराने-फटे वस्त्र त्यागकर नये वस्त्र धारण करते हैं, उसी प्रकार आत्मा पुराना देह त्यागकर नया देह धारण करती है। इसीलिये इस नश्वर शरीर के लिये शोक मत करो, मुझे हर्ष के साथ समाधिस्थ करो, प्रपंचकर परमार्थ करो, तुम्हारे शत्रु तुम्हारे शरीर में छिपे हुए हैं, उन्हें शरीर से दूर भगाओ,
मुझे कदापि भूलें नहीं, तुम्हारे लिये मैं यहाँपर ही हूँ। दूसरे दिन ब्रह्ममुहूर्त में ही महाराज ने अपनी समाधि के लिये स्थल की जगह निश्चित कर ली थी। महाराज ने भक्तोंद्वारा अपने समाधि-स्थल का काम वायुवेग से पूरा कराया। महाराज का मन्दिर भक्तों के लिये श्रद्धा-स्थान के साथ-साथ विश्राम-स्थान भी बन गया था।
आखिर शालिवाहन शक माघ मास की पंचमी तिथि को अभिजित् मुहूर्त में ई०स० १८८८में महाराज ‘हर हर’ कहते हुए समाधिस्थ हुए। चारों ओर सब दूर-दूर तक खबर पहुँच गयी। लोग शोकाकुल हो गये, जिस सूरज ने उष्णता और प्रखर तेज दिया था। उस सूरज का अस्त हो गया था। सभी भक्त अन्धकार में डूब गये थे। अभी भी महाराज किसी-न-किसी रूप में भक्तों को दर्शन देकर उनकी इच्छाओं को पूरा करते हैं।
ई०स० २००१ के भादो महीने में नदी में भयंकर बाढ़ आयी थी। बाढ़ के पानी ने गाँव को चारों तरफ से घेर लिया था। बाढ़ के पानी के साथ गाँव में बड़े और विषैले साँप भी आ रहे थे। माता के पुजारी मन्दिर के कलश के पास ऊपरी भाग में जाकर बैठे थे। गाँव में हाहाकार मच गया था।
रात का समय था, इतने में बाढ़ का पानी माता और महाराज के मन्दिर में भी घुस गया था। माता और महाराज के समाधि- स्थल को बाढ़ के पानी का स्पर्श होते ही नदी का विराट् रूप शान्त हो गया था। कोरोना-जैसी महामारी से भी गाँव बचा रहा। यह है सन्त श्रीनारायणपुरीजी महाराजकी महिमा!

